भारत के इस गांव में हर घर में है एक टीचर, शिक्षकों के गांव के नाम से है मशहूर


आज हम आपको ऐसे गांव के बारे में बताने जा रहे है। जहाँ हर कोई पढ़ा लिखा है। वैसे तो हर माँ-बाप चाहते है की उनका बच्चा बड़ा होकर डॉक्टर, इंजीनियर, बैंक अफ़सर या कोई सरकारी महकमे में लग जाए. शायद ही कोई माता-पिता चाहते हों कि उनका बच्चा टीचर बने. समाज में तो ये कथन भी चलता है कि जिसे कुछ नहीं आता, जिसमें कोई प्रतिभा नहीं होती वो टीचर बनता है. शिक्षक तो पैसे ही खाते हैं, ये भी कहने से लोग बाज़ नहीं आते. आज हम आपको एक ऐसे गांव से रूबरू करवाएंगे जो शिक्षकों का गांव है.

एक जानकारी के मुताबिक, भारत के पश्चिम स्थित राज्य गुजरात के शहर अहमदाबाद से 90 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है एक ऐशा गांव जहां के हर घर से टीचर निकलता है. हडियोल नामक इस गांव में हर चौथा व्यक्ति या तो टीचर है या तो रिटायर्ड टीचर है. ये गांव है भारत का असल ‘गुरु ग्राम’. यहां आप किसी भी घर का दरवाज़ा खटखटा लीजिए, उस घर में एक न एक सर या मैडम ज़रूर मिल जाएंगे. दैनिक भास्कर के एक लेख के अनुसार, गुजरात का कोई भी ऐसा ज़िला नहीं है जहां हडियोल गांव से निकला शिक्षक न पढ़ा रहा हो.

हडियोल में ऐसे भी घर हैं जहां तीन वंशों से लोग बच्चों को पढ़ा रहे हैं.  साबरकांठा प्राथमिक शिक्षक संघ के प्रमुख संजय पटेल ने बताया कि गांव की इस अनोखी पहचान की शुरुआत 1955 में हुई. उस दौर में ये गांव शिक्षकों का गांव नहीं बना था. आज़ादी के लगभग 8 साल बाद  गांव के तीन लोगों ने बतौर शिक्षक काम करना शुरु किया. हडियोल के सबसे पुराने शिक्षकों में से एक हीराभाई पटेल ने बताया कि जब उन्होंने प्राइमरी टीचर्स सर्टीफ़िकेट कोर्स में दाखिला लिया तब उनके साथ गांव के सिर्फ़ 25 और लोग थे. उन दिनों टीचर बनने के लिए 7वीं पास करना ज़रूरी था, और पटेल ने ऐसे नौकरी शुरु की थी. उनके परिवार से 9 सदस्य टीचर बने.

 

बदलते दौर के साथ देशवासी भी शिक्षा का महत्त्व समझ रहे थे. गांधी जी के विचारों से प्रेरित होकर हडियोल निवासी गोविंद रावल और उनकी पत्नी सुमति बेन ने 1959 में एक स्कूल खोला, विश्वमंगलम. इस दंपत्ति का मकसद का गांव के बच्चों को शिक्षित करना. ये स्कूल हडियोल से लगभग 1.5 किलोमीटर की दूरी पर अकोदरा गांव में खोला गया. 1962 में इसी स्कूल के साथ एक महिलाओं के लिए एक पीटीसी कॉलेज खोला गया. गांव के प्राइमरी स्कूल में 5वीं तक पढ़ने के बाद छात्र और छात्राएं विश्वमंगलम में पढ़ने जाते.

उन दिनों महिलाओं के लिए ज़्यादा करियर विकल्प नहीं थे. मैट्रीकुलेशन के बाद कई महिलाएं पीटीसी कॉलेज में दाखिला लेने लगी. इसका दोहरा असर हुआ. कुछ गांव वालों ने ये भी बताया कि उन दिनों में शिक्षक को पैसों के साथ-साथ समाज में इज़्ज़त भी मिलती थी. 1990 के दशक के बोर्ड एग्ज़ाम टॉपर भी शिक्षक बनना चाहते थे. उस समय ज़्यादा उद्योग नहीं खुले थे और खेती करने से ज़्यादा अच्छा विकल्प था शिक्षक बनना.