मिलिए फौजी बेटों के ‘वनप्रेमी’ पिता से, अब तक 20 हज़ार से ज्यादा पेड़ो को दे चुके है नया जीवन


आज हम आपको एक शक्श के बारे में बताने जा रहे है जो बुढ़ापे में भी पर्यावरण संरक्षण जैसा नेक काम कर रहे हैं। चंद्रदेव सिंह यूपी के आजमगढ़ में रहने वाले है। जिन्हें अब उनके इलाके के लोग ‘वनप्रेमी’ के रूप में जानते हैं। आज हम आपको उनके इस सफर के बारे में बताएंगे की उन्होंने कैसे शुरुआत की ओर उनका ये सफर अच्छा रहा या बुरा?

फौजी के पिता है चंद्रदेव

चंद्रदेव आजमगढ़ के गांव देउरपुर कमालपुर के रहने वाले हैं। उनके दोनो बेटे फौज में भर्ती है। वो बताते है कि खेती-किसानी में उनका हमेशा से विशेष लगाव रहा है। जब उनके दोनों बेटे फौज में भर्ती हो गए तो लोगों ने उनसे कहा कि चंद्रदेव अब छोड़ो सब और आराम करो। अब तुम्हें कुछ करने की जरूरत नहीं है, लेकिन वो खुद को अपनी मिट्टी से दूर नहीं रख सके। वो नियमित रूप से अपने खेतों में जाते, घर के आस-पास के पौधों का रख-रखाव करते। इसी क्रम में करीब 15 साल पहले उन्होंने तय किया कि वो अधिक से अधिक पौधों को मरने से बचाएंगे।

वन संरक्षण सफर की शुरुआत

चंद्रदेव ने इस सफर की शुरुआत 2007 में की थी। वो बताते है ‘’वो साल 2007 था, जब मैंने पौधों को संरक्षित करने का जिम्मा उठाया था। मुझे कहीं भी कोई भी पौधा अनाथ मिलता मैं उसे अपने साथ घर ले आता और अपनी नर्सरी में रखता ताकि उसको हरा-भरा रख सकूं। धीरे-धीरे मेरी नर्सरी बड़ी हुई तो लोग मुझसे पौधे लेने के लिए आने लगे। आज भी मैं किसी को भी पौधे मुफ्त में दे देता हूं बदले में मेरी एक शर्त होती है, कि मुझसे पौधा ले जाने वाला इंसान उसके संरक्षण की पूरी जिम्मेदारी ले। मैं समय-समय पर उनके घर भी जाता हूं। ताकि मुझे तसली हो की मैंने जिसे पौधा दिया है वो उसकी सही तरह से देखभाल कर रहा हैं या नही। मैंने बरगद जैसे लाभकारी पौधों के बीज भी तैयार किए हैं ताकि हवा को अच्छा किया जा सके मेरी इस मुहिम में मेरे दोनों बच्चे आर्थिक रूप से मदद करते हैं।

चंद्रदेव से वनप्रेमी पड़ा नाम

आखिर में चंद्रदेव बताते हैं कि उन्हें इस बात की खुशी है कि अब लोग उनके काम की सराहना करते हैं। गांव की खाली पड़ी जमीन पर उनके लगाए पौधों की छाया में जब लोग घंटों बैठते हैं और ठंडी हवा का आनंद लेते हैं तो उन्हें लगता है कि उनकी मेहनत सफल हो रही है। चंद्रदेव अपनी आख़री सांस तक पौधों को बचाने में लगाना चाहते हैं। यही कारण है कि लोग उन्हें अब ‘वनप्रेमी’ कहकर बुलाने लगे हैं।