कही हर घर से निकलते है फौजी तो कही शिक्षक, पढ़े- लिखे गाँव की लिस्ट में अव्वल है ये गांव


इस दुनिया में हजारो शहर है जहाँ लाखो लोग पढ़-लिख कर आगे बढ़ है। एक पढ़े लिखे व्यक्ति की पहचान उसके गांव से ही होती है। अक्सर अपनी ज़िन्दगी में हमने सुना है कि उस गांव ये चीज बेहद प्रसिद्ध है. गांव ऐसे ही होते हैं, यहां अच्छी या बुरी कोई एक पहल पूरे गांव को अपने रंग में रंग लेती है. किसी गांव में अगर एक को शराब की लत लग जाए तो पूरा गांव शराबी होने से ज्यादा दिन बच नहीं पाता. ऐसे ही अगर किसी गांव में किसी अच्छी आदत का विस्तार होने लगे तो वह गांव इसी अच्छी आदत के लिए जाना जाता है.

दरअसल आपको बता दे बिहार के गया जिले के मानपुर का गांव पटवाटोली कभी लूम से चादर, तौलिया, गमछा बनाने के लिये प्रसिद्ध था लेकिन आज इसकी पहचान बदल चुकी है. पहले मैनचेस्टर ऑफ़ बिहार के नाम से जाना जाने वाला ये गांव आज विलेज ऑफ आईआईटियंस के नाम से प्रसिद्ध है. बता दें कि इस गांव से हर साल एक दर्जन से ज्यादा स्टूडेंट्स बिना किसी बड़ी कोचिंग में पढ़े जेईई जैसे कठिन एग्जाम को पास कर सिलेक्ट होते हैं. यहां के युवाओं ने आर्थिक सहयोग से गांव में एक लाइब्रेरी भी बनाई है.

भले ही कहा जाता हो कि इस गांव में ज्यादातर किसान है लेकिन आपको ये जानकर हैरानी होगी कि भले ही यहाँ रहने वाले लोग बैंक में नौकरी करते हों, शिक्षक हों, दुकान चलाते हों या कोई अन्य पेक्षा करते हों उन सबमें सामान्य बात यही है कि वे सभी संगीत से जुड़े हुए हैं. राग, वाद्य यंत्रों और शास्त्रीय संगीत के पंडितों के बारे में बहुत गहरी जानकारी है यहां के लोगों के पास. यहाँ के लोग संगीत में खूब मगन रहते है।

गुजरात के शहर अहमदाबाद से 90 किलोमीटर दूर स्थित हडियोल एक ऐसा गांव है जहां के हर घर से एक न एक व्यक्ति शिक्षक बनता है. एक प्रसिद्ध न्यूज़ चैनल के अनुसार हडियोल गांव में हर चौथा व्यक्ति शिक्षक है. इनमें कई अभी भी पाठन कार्य में हैं तो कई रिटायर हो चुके हैं. ये गांव भारत का असल ‘गुरु ग्राम’ माना जाता है. गांव की इस अनोखी पहचान की शुरुआत 1955 में हुई थी. उस दौर में ये गांव शिक्षकों का गांव नहीं बना था. आज़ादी के लगभग 8 साल बाद  गांव के तीन लोगों ने बतौर शिक्षक काम करना शुरु किया था और तब से ये सिलसिला बढ़ता चला गया |

इतना ही नहीं राजस्थान के एक गांव में ज्यादातर फौजी है तो राजस्थान के नागौर जिले का जालसू नानक हाल्ट रेलवे स्टेशन देश का इकलौता ऐसा स्टेशन है जिसे यहां के ग्रामीणों ने चंदा जमा कर के चलाया भी और इसे मुनाफे में भी ले आए. यहां के गांव वालों को इस रेलवे स्टेशन की देखरेख करते हुए 15 साल से ज्यादा हो चुके हैं. बता दें कि ये जुनूनी गांव एक तरह से फौजियों का गांव है. बताया जाता है कि यहां हर दूसरे घर में एक फौजी है. आज के समय में इस गांव से 200 से ज्यादा जवान सेना,  बीएसएफ, नेवी, एयरफोर्स और सीआरपीएफ में भर्ती हो कर देश की सेवा कर रहे हैं. इसके अलावा यहां 250 से ज्यादा रिटायर फौजी हैं. इन्हीं फौजियों की सुविधा के लिए 1976 में यानी करीब 45 साल पहले रेलवे ने यहां हाल्ट स्टेशन शुरू किया गया था.