जब थाने में पहुंची 100 साल की बूढी अम्मा तो पुलिस वालो ने जो किया वो शायद ही किसी ने सोचा होगा


उत्तर प्रदेश के आईपीएस ऑफिसर नवनीत सिकेरा के जीवन पर बनी भौकाल सीरीज को दर्शकों के बीच काफी पसंद किया जा रहा है। सीरीज में दिखाया गया है कि कैसे एक पुलिस अधिकारी यूपी के मुजफ्फरनगर जिले की गली-गली में बस चुके क्राइम का खात्मा करता है। भौकाल में जहां आईपीएस अधिकारी के तौर पर अभिनेता मोहित रैना छाए हुए हैं,

भौकाल सीरीज के पहले भाग में मुजफ्फरनगर के क्रिमिनल ‘शौकीन’ के खात्मे के बाद डेढ़ा भाई के नाम मशहूर पिंटू डेढ़ा और चिंटू डेढ़ा जिले पर अपना राज कायम करना चाहते हैं। दोनों भाई मुजफ्फरनगर में अपना भौकाल जमाने के लिए दिनदहाड़े लोगों की हत्या करते हैं और जिले के एसएसपी नवीन सिकेरा (मोहित रैना) को खुली चुनौती दे डालते हैं। अपनी डायलॉग डिलीवरी और एक्टिंग के जरिए पिंटू डेढ़ा बने प्रदीप नागर पूरी सीरीज में छाए रहे हैं और ठेट देसी अंदाज में विलेन के एक नए किरदार को गढा है।

नवनीत सिकेरा ने बूढ़ी मां का जिक्र किया है, – ‘आज करीब दोपहर 2 बजे मैं थाने में बैठा था, थाने के सामने से एक 100 वर्ष की  बूढ़ी मां आ रही थी, वो थाने में आईं, तो मैं उनके पास गया। वो कुछ बताना चाहती थीं, मैंने सबसे पहले उन्हें अपने पास ले जाकर बैठाया और फिर उन्हें पानी पिलायाl’

दादी, बोलीं- लाला हमारे पास चप्पल नहीं हैं, मेरे पांव जल रहे हैं। हमें एक जोड़ी चप्पल दिला दो। मैंने कहा- ठीक है दादी, अभी दिला देता हूं और मैंने तुरंत चप्पल मंगाकर उन्हें पहनाईं। मैंने फिर उनसे पूछा कि कुछ खा लीजिए तो उन्होंने मना किया और कहा कि नहीं लाला कुछ नही खाना हैं। मेरे कई बार कहने पर उन्होंने धीरे से मेरे कान मे कहा- लाला 5 रुपए के अंगूर मंगा दो बस। मैंने एक किलो अंगूर मंगाए और उन्हें दिए। वो अंगूर खाते हुए मुझसे बोलीं- लाला तुम भी खा लो, फिर मैं भी उनके साथ अंगूर खाने लगा।’तो उन्होंने बताया कि गाड़ी से और मैंने उन्हें किराया भी नही दिया।

मैंने पूछा कि क्यों, तो हंसते हुए बोलीं- मेरे पास पैसे ही नहीं थे। मैंने पूछा- गाड़ी वाला कुछ बोला नहीं, तो बोलीं- कुछ नही बोला। मैं उस गाड़ी वाले का, उसकी मानवता के लिए शुक्रिया अदा करता हूं। अभी भी बहुत अच्छे लोग हैं। फिर दादी को हमारे एक दीवान जी ने गाड़ी में बिठाया और ड्राइवर से कहा कि दादी जहां बोलें, उन्हें उतार देना। आज दिल खुश हो गया, ऐसे लोग आएं तो उनकी मदद जरूर करनी चाहिए।

नवनीत सिकेरा आगे की कहानी बताते हुए  लिखा, ‘अम्मा ने फिर मुझसे मेरा नाम पूछा, बोलीं- लाला का नाम बा…? मैंने अपना नाम बताया तो फिर पूछा- कहां से हो, मैंने बताया इलाहाबाद से हूं। दादी जानती हो, इलाहाबाद कहां है तो बोलीं- हां मेला लगता है ना वहां। मैंने कहा हां, गई हो आप कभी तो बोलीं- नहीं लाला गए नहीं हैं। मैंने पूछा- चलोगी मेरे साथ तो हंसने लगीं। फिर मैंने पूछा- दादी आप आई कहां से हो, तो उन्होंने अपने गांव का नाम बताया, जो मेरे थाने से लगभग 7 किमी दूर है।’