जानिए आखिर क्यों नवरात्रि में होती है मां के 9 रूपों की पूजा, इसके पीछे जुडी है ये कहानी


हिन्दुओं का सबसे पवित्र और उच्तम त्यौहार नवरात्रि होते है। बता दे चैत्र नवरात्रि की शुरुआत साल में सबसे पहली होती है।  हिंदू धर्म के मुताबिक, साल में चार नवरात्रि मनाई जाती हैं, हालांकि इनमें शारदीय नवरात्रि और चैत्र नवरात्रि का विशेष महत्व है। नवरात्रि नौ दिनों का पर्व है। इन नौ दिनों में नवदुर्गा की पूजा होती है। नवरात्र के दिनों में माता की विशेष पूजा होती है। लोग उपवास रखते हैं और माता के हर स्वरूप को प्रसन्न करने के लिए मंत्र उच्चारण और पाठ करते हैं। लेकिन क्या आपको पता है कि माता के वह नौ स्वरूप कौन से हैं। आइये आपको माता के इन नौ स्वरूपों से जुडी कुछ मान्यता बताई जाए।

जैसा की आप सभी जानते है नवरात्र का पहला दिन माता के पहले स्वरूप मां शैलपुत्री की पूजा होती है। मां पार्वती को शैलपुत्री के नाम से भी जाना जाता है। पर्वतराज हिमालय के घर पर जन्म लेने के कारण मां पार्वती को शैलपुत्री कहा जाता है। शैल का शाब्दिक अर्थ पर्वत होता है।माता शैलपुत्री हिमालय में पली-बड़ी हुई जिसके बाद से उन्हें हिमालय की देवी के रूप में भी जानने लगे।

माता का दूसरा नाम ब्रह्मचारिणी है इसके पीछे की भी बड़ी कहानी है माता पार्वती ने भगवान शिव को अपने पति के रूप में पाने के लिए वर्षों कठोर तप किया था। इस कारण उन्हें ब्रह्मचारिणी नाम मिला। ब्रह्मचारिणी का अर्थ है कठोर तपस्या का आचरण करने वाला।इस दिन माता की कठोर पूजा करने से मन चाहा फल मिलता है।

माता के नवरात्रो का तीसरा दिन जो महान कहा जाता है। तीसरे दिन माता चंद्रघंटा की पूजा होती है। मां पार्वती के मस्तक पर अर्ध चंद्रमा के आकार का तिलक लगा रहता है, इस कारण उनका एक स्वरूप चंद्रघंटा कहलाता है।

शास्त्रों में इसका काफी महत्व बताया गया है। इनकी उपासना से भक्त की सारी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं। भक्त को मोक्ष मिलता है। सूर्यमंडल की अधिष्ठात्री देवी होने के कारण इनका उपासक अलौकिक तेज और कांतिमय हो जाता है। कहा जाता है की माता पार्वती के पुत्र कार्तिकेय जी को स्कंद के नाम से भी जाना जाता है। इस कारण मां पार्वती को स्कंद माता भी कहते हैं।

माता के स्वरूप के पीछे की कहानी है की महिषासुर नामक अत्याचारी दैत्य का वध करने के लिए ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों ने मिल कर अपने तेज से माता को उत्पन्न किया था। देवी के प्रकट होने के बाद सबसे पहले उनके पूजा महर्षि कात्यायन ने की थी। इसलिए उनका नाम कात्यायनी पड़ा।

संकट हरने के लिए माता के कालरात्रि स्वरूप का जन्म हुआ। संकट को काल भी कहते हैं, हर तरह के काल का अंत करने वाली मां कालरात्रि कहलाती हैं।कहा जाता है उन्हें दिल से पूजने से सभी कष्टों का निवारण आसानी से हो जाता है।

भगवान शिव की अर्धांगिनी बनने के लिए माता गौरी ने वर्षों तक इतना तप किया था कि वह काली पड़ गई थीं। बाद में महादेव ने उनके तप से प्रसन्न होकर उन्हें अपनी पत्नी स्वीकार कर लिया था। उसके बाद भोलेनाथ ने माता गौरी को गंगाजी के पवित्र जल से स्नान कराया। मां गंगा के पवित्र जल से स्नान के बाद माता का शरीर बहुत गोरा और अद्भुत कांतिमान हो उठा, तब उसे उनका नाम महागौरी हो गया।

माता का नौवां स्वरूप सिद्धिदात्री है। वह भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करती है। इस कारण उन्हें सिद्धिदात्री कहते हैं। मान्यता है कि माता के इस स्वरूप की पूजा करने से सभी देवियों की उपासना हो जाती है।