ना फल ना फूल बल्कि देवी माँ के इस मंदिर में चढ़ाया जाता है चश्मा, होती है हर मनोकामना पूरी


पूरे देश में  नवरात्री की धूम मची हुई है. सभी देवी मंदिरों में 9 दिनों तक भक्तों का तांता लगा रहता है. एक तरफ जहां अपनी मनोकामना लेकर श्रद्धालु माता को प्रसाद और मन्नत पूरी होने के एवज में नारियल, पैसे, फूल और मिठाई चढ़ाते हैं. वहीं छत्तीसगढ़ के बस्तर में एक ऐसा मंदिर है जहां बस्तरवासी अपनी-अपनी मनोकामना पूरी होने के लिए देवी को काला चश्मा चढ़ाते हैं. यह मान्यता सैकड़ों सालों से लगातार चली आ रही है.

दरअसल बस्तर जिले के कांगेर वैली नेशनल पार्क के कोटमसर गांव में हर 3 साल के अंतराल में देवी बास्ताबुंदिन की जात्रा होती है. देवी को चश्मे चढ़ाकर जंगल के हरे भरे रहने की ग्रामीण भक्त कामना करते हैं. दरअसल बस्तर के आदिवासियों के लिए बस्तर के घने जंगल जीवन यापन के लिए सबसे उत्तम और कुदरती देन है. आदिवासियों का मानना है कि भगवान उन्हें जंगल वरदान के रूप में भेंट किया है. आदिवासी अपने जंगल को जान से भी ज्यादा चाहते हैं. वे ना केवल जगंल का संरक्षण संवर्धन मन से करते हैं बल्कि अपनी आराध्य देवी से मन्नत मांगते हैं कि उनके जंगल को किसी की बुरी नजर ना लगे.

इस साल होगा मेले का आयोजन

कांगेर वैली में निवास करने वाले आदिवासियों की संस्कृति के विशेष जानकार गंगाराम बताते हैं कि पहले एक ही परिवार के द्वारा देवी की पूजा की  जाती थी. कुछ सालों से पूरे गांव या पूरे बस्तरवासियों ने इसे अपना लिया है. मंदिर के पुजारी जीतू का कहना है कि इस साल भी देवी की कृपा होगी और हरे भरे वन की देवी रक्षा करेगी. फिर से पूरा गांव देवी को चश्मा चढ़ाने में कामयाब होंगे. मंदिर के सिरहा संपत बताते हैं कि देवी को चढ़ाए गए ज्यादातर चश्मे भक्त अपने साथ ले जाते हैं. मेले के दूसरे दिन देवी को चश्मा पहनाकर पूरे गांव की परिक्रमा करवाई जाती है. ताकि बास्ताबुंदिन देवी की कृपा पूरे गांव में बनी रहे और वह पूरे ग्रामवासियों की रक्षा करें.

भक्त चढ़ाते हैं चश्मा

इतना ही नहीं किसी की बुरी नजर ना लगे इसके लिए बकायदा अपने आराध्य देवी को नजर का चश्मा भी चढ़ाते हैं. सदियों से चली आ रही देवी के प्रति इस मन्नत को युवा पीढ़ी ने भी अपना लिया है. वे भी देवी को चश्मा चढ़ाने लगे हैं. देवी को चश्मा चढ़ाने के लिए कोटोमसर वासी तीन साल का इंतजार करते हैं. इसकी वजह है कुटुमसर उसके आसपास के गांव के लोग अपने-अपने आर्थिक सहयोग से इस देवी पूजा के अवसर का आयोजन करते हैं. देवी पूजा करने और मन्नत मांगने वालों का मजमा इतना जबरदस्त लगता है कि मजमा मेले की शक्ल ले लेता है.